“इंतज़ार” – ख़त 1

तुम्हारे किसी दोस्त के या मेरी कोई सहेली के इंतज़ार में, एक अँधेरे कमरे के कोने में उम्मीद की लौ जलाए अपनी आँखों में, बैठी थी कल सारा वक़्त | सुबह आँख खुली तो चोखट सुनसान थी और दरवाज़ा खामोश, आज फिर मेरे ख़त का जवाब नहीं आया था | पल भर के लिए खुद को तस्सल्ली देने खातिर एक ख्याल सीने में सुकून की शक्ल लेकर उभरा ! तुम्हे ख़त में अपने जज्बातों की तस्वीर दिखाने की चाह में कुछ नमकीन कतरों ने आँखें छोड़ कागज़ से इश्क लड़ाया था, उस इश्क से जन्मी नमी ने तुम तक पहुचते हुए शायद दम तोड़ दिया होगा | Single Woman Alone Swinging On The Beach

दुसरे ही पल इसी सोच ने मेरे सीने में चुभन भी पैदा कर दी, अब ख्याल करवट बदल चुका था ! तो मैं अब तुमसे इतनी दूर जा चुकी हूँ की मेरे आँखों के आंसूं भी तुम्हारे दिल में मेरे लिए नफरत को खत्म नहीं कर पा रहे | आज इसके आगे कुछ और लिखकर दिल हल्का नहीं करुँगी, ये ख्याल मेरा दर्द बढ़ाएगा और अब ये दर्द तुम्हे लौटाएगा मुझे या मेरा जिस्म मिट्टी होगा | बदन की बात होती हर रात रंगीन बना लेती, मगर तुमसे इश्क कुछ और है मेरा |

तुम्हारे ख़त के इंतज़ार में बेबस
तुम्हारी ‘माया’ !

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